लिख-प्रदेश। An Ideal State.
मांग करना और नयी मांग करना हमेशा से ही मानव समाज की पहचान रही है, याद कीजिये जब आप बच्चे थे, नहीं तो अब आपके अपने बच्चे तो होंगे, इसके आलावा अगर आप बीवी नहीं हैं तो आपकी बीवी होगी, और अगर ये सब भी नहीं तो आप लोक-सभा के स्पीकर के दुःख से वाकिफ़ ज़रूर होंगे और आप ये अवश्य जानते होंगे की मांग क्या होती है.
मेरी भी एक मांग है एक प्रदेश जो सिर्फ लेखकों के लिए हो. क्यों? जब धर्म, जाती, और भाषा के नाम पर नया प्रदेश माँगा जा सकता है तो पेशे के नाम पर क्यों नहीं, लेखन. माना की पेशा गिरा हुआ माना जाता है, बुरा समझा जाता है, आप कहते हैं की ये नीच से भी निम्न कोटि का है, लेखक को लगता है की ये वैश्यावृत्ति से भी गिरा हुआ काम है, …लेकिन ये है, आपके और हमारे बीच में हर कहीं है. इसे आप चाह कर भी नकार नहीं सकते. समाचार पत्र से समाचार चैनल, साबुन के विज्ञापन से डेली सोप तक, कबूतर के संदेश से आज के ईमेल तक, संसद की बहस से सास-बहु की भौंक तक, लेखन हर कहीं है. तो इसीलिए मेरी ये मांग है की लेखकों के लिए एक नए प्रदेश का निर्माण किया जाए; लिख-प्रदेश.
इसमें रहने वाले सिर्फ लेखक होंगे और उनके करीब के लोग, वैसे लेखकों के कोई करीब होता नहीं तो इस तेरह से सारे लेखक एक दूसरे के करीब होंगे, और उनका एकाकी-पन दूर होगा. आपका दूसरा प्रश्न ये हो सकता है की आखिर इस नए प्रदेश की मांग क्यों, मेरा तर्क है की क्यों नहीं? देखिये लेखक स्वाभाव से विनम्र होता है, शील होता है, और कुत्ते की तेरह वफादार होता है तो अगर एक प्रदेश में सारे लोग इस तरह के हैं तो उस प्रदेश की उन्नति कौन रोक पायेगा. दूसरा लेखक और कुछ हो न हो पढ़ा-लिखा अवश्य होता है, तो सोचिये एक ऐसा प्रदेश जिसकी साक्षरता दर 110 प्रतिशत हो, 110 क्यों? क्योंकि आज की दुनिया में कौन ऐसा लेखक होगा जो स्नातक नहीं है, और अधिकतर तो स्नातकोत्तर होंगे, इस तरह की साक्षरता को सिर्फ 110 प्रतिशत ही कहा जायेगा ना. दूसरा लेखक भगवान में विश्वास नहीं करता, जो करता होता है वो ठुड्डे खा-खा के भगवान को गालियाँ देने लगता है, अब जब क्योंकि किसी भी प्रकार के धर्म का टंटा ही नहीं यानि दंगे भी नहीं… हर ओर शांति का माहौल, ना पंडत का पत्थर ना मुल्ले की बांग.
सारे लोग एक जैसी पवित्र मानसिकता वाले. सबमे कितना सोहार्द और दुःख-दर्द बाँटने का भाव. तनिक सा सोचिये अगर पहाड़ नहीं हैं, रमणीय स्थल नहीं हैं तो लेखक कल्पना से काम चला लेगा, सुबह नित्य-क्रम के समय पानी नहीं आया तो वो जंगल में चला जायेगा, प्रकृति से एक होने, प्रेरणा लेने, traffic में फंसे होने के बावजूद कभी उसका काम नहीं रुकेगा, लेखक कहीं भी लिख सकता है. कोई किसी को दुत्कारेगा नहीं क्योंकि सभी एक हैं. एक लेखक अच्छी अच्छी बातें लिखेगा दूसरा उसे अमल में लायेगा, कहीं कोई कानून कभी टूटेगा ही नहीं, तो पुलिस, कोर्ट, वकील, जज, दलाल सब से छुटकारा, इस खर्चे को उन्नति में लगाया जायेगा. सबसे ख़ास बात इस लिख-प्रदेश की कभी कोई ज़रुरत होगी ही नहीं, क्योंकि सारे लेखक हैं, और लेखकों की ज़रुरत आखिर होती क्या है, आधी बोतल और पूरी औरत, जो इस लिख-प्रदेश में राज्य-सरकार ही उपलब्ध कराएगी.
क्योंकि जब रोटी या पानी की बुरी आदत कभी लेखक को पड़ी ही नहीं तब सूखे या बाढ़ की हालत में केंद्र सरकार को इस राज्य की कोई मदद नहीं करनी होगी, ये पैसा वो दुसरे अ-लेखक राज्य को दे सकती है. रिश्ता नाम की चिड़िया से लेखक का कभी पाला पड़ा ही नहीं और पड़ा भी तो घोंसला बसने से पहले चिड़िया उड़ गयी, यानि की जब रिश्ते ही नहीं तो शादी-ब्याह, तलाक़, जन्म-दिन जैसे आडम्बरों पर कितना पैसा व्यर्थ होने से बच जायेगा, ये पैसा लिख-प्रदेश दूसरे प्रदेशों को दान में देगा. एक आडम्बर-रहित सच्चा प्रदेश, जिसमे दुनिया के दुखियारे लेकिन अति-सच्चे लोग. तो मैंने आपके सामने एक ऐसा खाका प्रस्तुत किया है जो शिक्षित, अधर्मी और उन्नत है.
इस प्रदेश की आवश्यकता इसलिए भी आन पड़ी क्योंकि आज के हालात में लेखक कभी उन्नत हुआ ही नहीं, लेखक और उन्नत विलोम हैं, अगर आपके मस्तिष्क में कुछ बड़े लेखकों के नाम आ रहे हैं तो वो अपवाद हैं नीयम नहीं और इस तरह से ये बात और भी अच्छे तरीके से साबित होती है की लेखक को वर्षों की इस दासता से छुटकारा चाहिए.
लिख-प्रदेश में बात बदलेगी. यहाँ सारे उपेक्षित लेखक एक साथ रहेंगे, अपमान से दूर, इसका पुण्य उन सबको मिलेगा जो इस प्रदेश का समर्थन करते हैं. तो समाज के सताए लोग जिनका दुःख कई सहस्त्र वर्ष पुराना है और सुख उनसे लाईट इअर्स दूर है, क्यों ना उनके जीवन में उजियारा हो, इस घोर जटिल और अति कुटिल जग से उन्हें हल्की सी छूट मिले. उन्हें अपना एक प्रदेश मिले. लिख-प्रदेश.
लेकिन लेखकों का ये आदिवासी कबीला कभी उन्नत हो क्यों नहीं पाया, ये एक षड़यंत्र है जो सारी दुनिया ने मिल के बनाया और आज तक कारगर भी साबित हुआ. आखिर दुनिया को ये ज़रुरत क्यों पड़ी की वो हम लेखकों के प्रति षड़यंत्र रचें, पहले जानिये और फिर मानिए, लेखक ही समाज का वो दर्पण है जो बिना किसी धूल की परत के सही दृश्य दिखाता है, वो उसमे अपने लाभ और हानि की परवाह नहीं करता, वो बस सच बताता है, लेकिन सच से किसका सरोकार रहा है, झूठ और पाखंड ने ही इस विश्व पर हमेशा शासन किया. याद किजिये कई सौ साल पहले एक लेखक ने कहा था हंस चुगेगा दाना-दुनका कौवा मोती खायेगा, आज हर तरफ यही हो रहा है, है ना, क्यों, क्योंकि किसी ने उस लेखक की बात समझने का प्रयास ही नहीं किया. इसलिए हर काल में, हर देश में, हर प्रान्त में लेखकों की दुर्गति हुई. लेकिन अब नहीं, क्योंकि मैंने लिख-प्रदेश जैसे क्रांतिकारी विचार को जन्म दे दिया है. ये क्रांति अब स्वाइन फ़्लू की तेरह फैलेगी और पूरी दुनिया के लेखक धीरे धीरे करके स्वंतंत्र होंगे. पहले हमारे देश में ये महान प्रदेश बनेगा तदापि इस प्रदेश के दायरा बढेगा, धीरे-धीरे हम पूरे देश पे कब्ज़ा करेंगे उसके बाद हम रुख करेंगे यूरोप और अमेरिकी देशों की तरफ. (हमारे आस पास जो देश हैं वो लेखन और लेखक से परे हैं उन्हें ऐसे ही रहने देंगे.) एक ऐसी क्रांति होगी जो रोके नहीं रुकेगी, एक ऐसा सैलाब होगा जो प्रलय से थोडा ही कम होगा लेकिन इस से हर तरफ सत्य की स्थापना होगी. यानी लिख-प्रदेश असल में सत्य की स्थापना की तरफ उठाया गया पहले प्रयास है. सत्य में भागीदार बनें, इस प्रदेश का समर्थन करें.












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